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नरक में जीव को किस स्थिति में रखा जाता है?

नरक में जीव — जंजीरों में बँधा, पीठ पर लोहे का भार, रक्त वमन करता, निरंतर विलाप करता।

संक्षिप्त उत्तर

नरक में जीव — जंजीरों में बँधा, पीठ पर लोहे का भार, रक्त वमन करता, निरंतर विलाप करता। मानसिक रूप से भय और पश्चाताप में, आत्मिक रूप से विवश, सामाजिक रूप से पूर्णतः अकेला।

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विस्तृत उत्तर

गरुड़ पुराण में नरक में जीव की स्थिति का वर्णन अत्यंत करुणाजनक और भयावह है।

शारीरिक स्थिति — जीव जंजीरों और पाश में बँधा, तप्त धरती पर खड़ा या लेटा हुआ, रक्त वमन करता हुआ। गरुड़ पुराण में कहा गया है — 'वे पापी गरदन, हाथ और पैरों में जंजीरों से बँधे होते हैं। उनकी पीठ पर लोहे के भार होते हैं।'

मानसिक स्थिति — निरंतर भय, पश्चाताप और असहायता। जीव अपने पापों को याद करते हुए और अपनों को पुकारते हुए विलाप करता रहता है।

आत्मिक स्थिति — यमराज के न्याय के समक्ष पूर्णतः विवश। कोई भागने का उपाय नहीं, कोई बचाव नहीं। कर्म के न्याय से पलायन असंभव।

सामाजिक स्थिति — पूर्णतः अकेला। जिन परिजनों के लिए जीवन में पाप किए, वे यहाँ नहीं हैं। कोई मित्र नहीं, कोई सहायक नहीं।

गरुड़ पुराण में यह भी वर्णित है कि जीव नरक में 'जोर-जोर से रोता है' परंतु 'यमदूत उस पर बिल्कुल भी दया नहीं करते।'

यह स्थिति जीवन में किए गए उन सभी कर्मों का दर्पण है जो दूसरों को इसी तरह की पीड़ा में रखते थे।

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