विस्तृत उत्तर
साधना साहित्य में नीलकंठ की स्तुति के लिए दो प्रमुख पाठ मिलते हैं:
नीलकंठ कवच: यह मुख्य रूप से रक्षणात्मक प्रकृति का होता है। कवच के श्लोकों में भगवान नीलकंठ से शरीर के विभिन्न अंगों की रक्षा करने की प्रार्थना की जाती है। इसका फल भूत-प्रेत और पिशाचों के नाश और सर्वसिद्धि प्रदान करने वाला बताया गया है। इसमें 'पातु' (रक्षा करें) जैसी क्रियाएँ होती हैं।
नीलकंठ अघोरास्त्र स्तोत्र: यह तांत्रिक पाठ केवल रक्षात्मक नहीं, बल्कि अत्यंत उग्र और आक्रामक है। इसमें 'हन हन', 'दह दह', 'छिंदी छिंदी' जैसे उग्र बीज मंत्रों का प्रयोग होता है। यह विष, ज्वर, और परविद्या को उन्मूलन करने के लिए प्रयुक्त होता है।





