विस्तृत उत्तर
कपटमुनि (कालकेतु) ने प्रतापभानु के ब्राह्मण-भोज की रसोई में विभिन्न पशुओं का माँस पकाकर मिला दिया। जब राजा ब्राह्मणों को परोसने लगा, तभी आकाशवाणी हुई।
चौपाई — 'परुसन जबहिं लाग महिपाला। भै अकासबानी तेहि काला। बिप्रबृंद उठि उठि गृह जाहू। है बड़ि हानि अन्न जनि खाहू। भयउ रसोई भूसुर माँसू॥'
इसका अर्थ — ज्यों ही राजा परोसने लगा, उसी काल (कालकेतुकृत) आकाशवाणी हुई — हे ब्राह्मणो! उठ-उठकर अपने घर जाओ; यह अन्न मत खाओ। इस (के खाने) में बड़ी हानि है। रसोईमें ब्राह्मणोंका माँस बना है।
आकाशवाणी सुनकर सब ब्राह्मण उठ खड़े हुए। राजा व्याकुल हो गया पर होनहार वश उसके मुँहसे एक बात भी न निकली।
दोहा — 'बोले बिप्र सकोप तब नहिं कछु कीन्ह बिचार। जाइ निसाचर होहु नृप मूढ़ सहित परिवार॥'
अर्थ — तब ब्राह्मण क्रोधसहित बोल उठे — उन्होंने कुछ भी विचार नहीं किया — अरे मूर्ख राजा! तू जाकर परिवारसहित राक्षस हो।
