विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण में प्रेत को जल की प्राप्ति के विषय में तर्पण और पिंडदान के माध्यम से वर्णन किया गया है।
तर्पण से जल — 'तर्पण' शब्द का अर्थ ही है 'तृप्त करना।' पितृपक्ष में और मृत्यु के बाद के संस्कारों में जल और तिल से किया गया तर्पण मृत आत्मा को जल पहुँचाता है। यह विश्वास है कि इस तर्पण-जल से प्रेत की प्यास बुझती है।
पिंडदान से — पिंडदान में जल और अन्न दोनों मिश्रित होते हैं। इससे प्रेत को जल-तत्व का पोषण मिलता है।
जलदान — जिस व्यक्ति ने जीवन में जलदान किया हो, प्याऊ लगाई हो — उसे यममार्ग और प्रेत-अवस्था में भी जल की कुछ सुविधा मिलती है।
नदियों में प्रवाह — गया और प्रयागराज जैसे तीर्थस्थानों पर नदी में जल-तर्पण और पिंडदान करने का विशेष महत्व है — माना जाता है कि यह सीधे पितरों और प्रेत-आत्माओं को पहुँचता है।
जल न मिलने पर — यममार्ग और प्रेत-अवस्था में जल का घोर अभाव है। जिसके परिजन तर्पण नहीं करते, उसे प्यास की असहनीय पीड़ा होती है।





