विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण का सबसे महत्वपूर्ण और प्रसिद्ध भाग 'प्रेतकल्प' है। यह गरुड़ पुराण के द्वितीय भाग (उत्तर खंड) में आता है।
प्रेतकल्प का स्वरूप — 'प्रेतकल्प' में पैंतीस अध्याय हैं। 'इन अध्यायों में मृत्यु का स्वरूप, मरणासन्न व्यक्ति की अवस्था, तथा उनके कल्याण के लिए अंतिम समय में किए जाने वाले क्रिया-कृत्य का विधान है।'
प्रेतकल्प की विषय-वस्तु — यमलोक, प्रेतलोक और प्रेत योनि क्यों प्राप्त होती है, उसके कारण, दान महिमा, प्रेत योनि से बचने के उपाय, अनुष्ठान और श्राद्ध कर्म — इन सबका विस्तृत वर्णन इसमें है।
प्रेतकल्प क्यों पढ़ा जाता है — गरुड़ पुराण का पाठ मृत्यु के बाद 13 दिनों तक किया जाता है। इसमें से प्रेतकल्प का पाठ मृत आत्मा के कल्याण के लिए और परिजनों को कर्तव्य-बोध कराने के लिए विशेष रूप से किया जाता है।
नाम का अर्थ — 'प्रेत' अर्थात मृत आत्मा और 'कल्प' अर्थात विधान या नियम। इस प्रकार 'प्रेतकल्प' का अर्थ है — मृत आत्माओं के विषय में विधान।





