विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण के प्रेतकल्प में कर्म का वर्णन एक सुनिश्चित शास्त्रीय उद्देश्य के साथ है।
कर्म-न्याय का प्रमाण — प्रेतकल्प यह सिद्ध करता है कि ब्रह्मांड में कोई भी कार्य बिना फल के नहीं होता। पाप का फल नरक और यातना, पुण्य का फल स्वर्ग और सुख — यही कर्म का नियम है जो प्रेतकल्प में जीवंत रूप से वर्णित है।
जीवन में धर्माचरण की प्रेरणा — गरुड़ पुराण के तृतीय अध्याय में यमदूत पापियों से कहते हैं — 'अरे दुराचारियों! तुमने दुराचरण क्यों किया?' यह उलाहना कर्म-वर्णन का व्यावहारिक उद्देश्य है — जीवित व्यक्ति इसे सुनकर पापकर्म से विरत हो।
कर्म और परलोक का संबंध — प्रेतकल्प में स्पष्ट किया गया है कि 'मृत्यु के बाद केवल कर्म ही साथ जाते हैं।' यह वर्णन इसीलिए है कि मनुष्य समझे — संसार में जो भी करता है वह परलोक में भोगना होगा।
कर्म और दान का समन्वय — प्रेतकल्प में पाप-कर्मों के दंड का वर्णन करने के साथ-साथ दान, पुण्य और भक्ति द्वारा कर्म के दुष्प्रभाव को कम करने के उपाय भी बताए गए हैं।
परिजनों को कर्तव्य-बोध — श्राद्ध, पिंडदान और दान भी कर्म हैं। प्रेतकल्प में इन कर्मों का विधान बताना इसीलिए है कि परिजन अपना कर्तव्य समझें।





