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विस्तृत उत्तर
वर्णन के अनुसार बृहद् पुराणसंहिता प्रत्येक द्वापरयुग में ब्रह्मपुराण आदि अठारह पुराणों के रूप में व्यासजी द्वारा विभक्त होती है। अलग-अलग मन्वन्तरों में अनेक व्यासों द्वारा पुराणों को संक्षिप्त और विभक्त करने की बात भी कही गई है। इसी क्रम में लिङ्गपुराण को अठारह पुराणों में ग्यारहवाँ कहा गया है।
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शास्त्रीय स्रोत
श्रीलिङ्गमहापुराण, पूर्वभाग, अध्याय 2, PDF पृष्ठ 15, श्लोक 2-3
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