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विस्तृत उत्तर
संन्यास का सही अर्थ विहित कर्मों और निषिद्ध कर्मों में दोष-गुण बुद्धि का त्याग है। पाठ में कहा गया है कि यही त्याग संन्यास है। इष्ट और अनिष्ट कर्मों को भलीभाँति छोड़ना न्यास कहा गया है। इसलिए संन्यास केवल बाहरी आश्रम-परिवर्तन नहीं, बल्कि कर्मों के प्रति दोष-गुण की आसक्ति और इष्ट-अनिष्ट के आग्रह का आंतरिक त्याग है।
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शास्त्रीय स्रोत
श्रीलिङ्गमहापुराण, पूर्वभाग, अध्याय 10, PDF पृष्ठ 59, श्लोक 27
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