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विस्तृत उत्तर
अमृतत्व पाने का मार्ग त्याग बताया गया है। पाठ में कहा गया है कि योगी को अमृतत्व के लिये भोगों का सदैव त्याग करना चाहिए। श्रुति और स्मृति के ज्ञाताओं में श्रेष्ठ मुनियों से कहा गया है कि त्याग से ही अमृतत्व की प्राप्ति सम्भव है। कर्म, संतान या द्रव्य आदि साधनों से अमृतत्व नहीं मिलता। इसलिए मन, वाणी और कर्म से विषयों के राग से निवृत्ति करना आवश्यक बताया गया है।
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शास्त्रीय स्रोत
श्रीलिङ्गमहापुराण, पूर्वभाग, अध्याय 8, PDF पृष्ठ 43, श्लोक 26-28
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