विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण के तृतीय अध्याय में शाल्मली नरक के वृक्ष और काँटों का विस्तृत वर्णन है।
शाल्मली वृक्ष का स्वरूप — 'वहाँ जलती हुई अग्नि के समान प्रभा वाला एक विशाल वृक्ष है, जो पाँच योजन में फैला हुआ है तथा एक योजन ऊँचा है।' यह वृक्ष स्वयं ही अग्नि की भांति दीप्त है।
काँटे — शाल्मली वृक्ष के काँटे तलवार की धार के समान तीखे हैं। 'जो पापी इस वृक्ष पर चढ़ाए जाते हैं, उनके अंग इन काँटों से बींधे जाते हैं।'
नीचे मुख करके लटकाना — 'उस वृक्ष में नीचे मुख करके उसे साँकलों से बाँधकर वे दूत पीटते हैं। वहाँ जलते हुए वे रोते हैं, पर वहाँ उनका कोई रक्षक नहीं होता।'
भूख-प्यास — 'उसी शाल्मली-वृक्ष में भूख और प्यास से पीड़ित तथा यमदूतों द्वारा पीटे जाते हुए अनेक पापी लटकते रहते हैं।'
निराशा — 'वे आश्रयविहीन पापी अंजलि बाँधकर यमदूतों से गुहार लगाते हैं' परंतु कोई नहीं सुनता।





