विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण में मृत्यु के बाद किए जाने वाले श्राद्धों का एक व्यवस्थित क्रम बताया गया है।
प्रथम चरण (मृत्यु से 10 दिन) — दशगात्र। प्रतिदिन एक पिंड। दसवें दिन क्षौरकर्म।
द्वितीय चरण (ग्यारहवाँ दिन) — एकादशाह। शय्यादान, गोदान, वृषोत्सर्ग, अष्टमहादान। सपिंडीकरण का प्रारंभ।
तृतीय चरण (बारहवाँ-तेरहवाँ दिन) — षोडश श्राद्धों की पहली श्रृंखला (मलिनषोडशी)। सपिंडन श्राद्ध।
चतुर्थ चरण (प्रथम वर्ष) — प्रतिमास एकोद्दिष्ट श्राद्ध। षोडश श्राद्धों की दूसरी श्रृंखला।
पंचम चरण (वार्षिक) — एक वर्ष बाद पूर्ण सापिंडन श्राद्ध। गरुड़ पुराण के तेरहवें अध्याय में — 'एक वर्ष पूर्ण हो जाने पर श्राद्ध में हमेशा तीन पिंड दान करना चाहिए।'
षष्ठ चरण (गया श्राद्ध) — पुत्र द्वारा गया में पिंडदान। गरुड़ पुराण में — 'गया श्राद्ध करने से पितर भगवान गदाधर की कृपा से परम गति प्राप्त होते हैं।'
इस क्रम में प्रत्येक चरण पिछले चरण को पूरा करता है और प्रेत को पितर और अंततः मुक्ति की ओर ले जाता है।





