विस्तृत उत्तर
सोलह सोमवार का व्रत पूर्ण होने पर 17वें सोमवार को उद्यापन करना अनिवार्य है। उद्यापन के लिए गेहूं के आटे को घी में भूनकर और गुड़ मिलाकर 'चूरमा' (पंजीरी) का प्रसाद बनाया जाता है। 'ॐ नमः शिवाय' मंत्र से काले तिल, जौ, घी और समिधा का प्रयोग कर दशमांश हवन किया जाता है। चूरमे के तीन भाग किए जाते हैं— एक शिवजी को, एक बांटने के लिए, और एक स्वयं के लिए। इसके बाद ब्राह्मणों को श्वेत वस्त्र, चावल, दूध, चांदी या दक्षिणा का दान दिया जाता है और शिवभक्त ब्राह्मणों व दंपतियों को सात्विक भोजन कराया जाता है।



