विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण के आठवें अध्याय में स्वर्णदान का विशेष और अत्यंत महत्वपूर्ण वर्णन है।
देवताओं और धर्मराज के सभासदों की संतुष्टि — गरुड़ पुराण में कहा गया है — 'ब्रह्मा आदि देवता, ऋषिगण तथा धर्मराज के सभासद — स्वर्णदान से संतुष्ट होकर वर प्रदान करने वाले होते हैं।'
प्रेत-उद्धार के लिए — इसके आगे कहा गया है — 'इसलिए प्रेत के उद्धार के लिए स्वर्णदान करना चाहिए।' स्वर्णदान प्रेत की मुक्ति में विशेष भूमिका निभाता है।
त्रिलोक को संतुष्ट करने वाला — गरुड़ पुराण में स्वर्णदान को उन दानों में बताया गया है जिनसे 'भूलोक, भुवर्लोक और स्वर्गलोक के निवासी — मनुष्य, भूत-प्रेत तथा देवगण — सभी संतुष्ट होते हैं।'
प्रेत घट दान — 'प्रेत घट दान' में एक सोने के घड़े में कुशा, तिल रखकर दान किया जाता है। यह प्रेत-मुक्ति का एक विशेष साधन है।
स्वर्ण का पवित्र गुण — स्वर्ण की पवित्रता और शुद्धता उसे दिव्य देवताओं को प्रिय बनाती है। इसीलिए यज्ञ और दान में सोने का विशेष स्थान है।


