विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण में वैतरणी नदी का वर्णन मृत्यु के बाद की यात्रा के सबसे भयावह अवरोध के रूप में किया गया है। यह नदी मृत्युलोक और यमलोक के बीच स्थित मानी गई है और प्रत्येक जीव को यमलोक पहुँचने के लिए इसे पार करना होता है।
वैतरणी' शब्द का संबंध 'वितरण' अर्थात दान से जोड़ा गया है। शास्त्रों में कहा गया है कि दान रूपी पुण्य से इस नदी को नौका में बैठकर पार किया जा सकता है — इसीलिए इसे वैतरणी कहते हैं। जिसने जीवन में दान किया हो, उसके लिए यह नदी पार करना सुगम होता है।
वैतरणी नदी को कहीं-कहीं गंगा का रौद्र रूप भी कहा गया है। जिस प्रकार गंगा पापों को नष्ट करती हैं, उसी प्रकार वैतरणी पापों का परिणाम दिखाती है। गरुड़ पुराण के चतुर्थ अध्याय में इस नदी का अत्यंत विस्तृत वर्णन है।
विष्णु पुराण और अन्य पुराणों में भी इस नदी का उल्लेख मिलता है। यह नदी पापों का शोधन करने वाली और कर्म-न्याय की प्रक्रिया का अंग है।





