विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण में यममार्ग पर जीव की बेहोशी का उल्लेख स्पष्ट रूप से किया गया है — 'थककर जगह-जगह गिरता और मूर्च्छित होता हुआ।' यह बेहोशी कई कारणों से होती है।
शारीरिक कारण — सूक्ष्म शरीर में भी संवेदनशीलता होती है। भूख, प्यास, गर्मी, कोड़ों की मार और अत्यधिक पीड़ा — इन सबके संयुक्त प्रभाव से जीव मूर्च्छित हो जाता है।
मानसिक कारण — पापकर्मों की स्मृति, नरक का भय, परिजनों से बिछुड़ने का दुख — ये सब मानसिक पीड़ाएँ इतनी गहरी होती हैं कि जीव उन्हें सहन नहीं कर पाता और बेहोश हो जाता है।
प्रतीकात्मक अर्थ — यह बेहोशी उस अचेतनता का प्रतीक है जिसमें पापी व्यक्ति जीवन भर रहा। उसने धर्म को, ईश्वर को, अपनी आत्मा को कभी नहीं देखा — अब मृत्यु के बाद भी वह उसी अचेतनता को भोग रहा है।
गरुड़ पुराण में यह भी कहा गया है कि बेहोश होने पर भी यमदूत उस जीव को उठाकर आगे ले जाते हैं। बेहोशी भी राहत नहीं देती — जैसे ही होश आता है, यातना फिर शुरू हो जाती है।
यह वर्णन पाप की उस निरंतर पीड़ा का चित्रण है जिससे कोई भागने में समर्थ नहीं।





