विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण में पिंडदान के अभाव में जीवात्मा की दशा का अत्यंत करुणाजनक वर्णन है।
गरुड़ पुराण में स्पष्ट कहा गया है — 'जिनका पिंडदान नहीं होता, वे कल्पान्त तक प्रेत बनकर निर्जन वन में भ्रमण करते रहते हैं।' यह अवस्था अत्यंत दुखद है — न शरीर है, न गति है, न मुक्ति।
पिंडदान के बिना जीवात्मा को यममार्ग पर चलने की शक्ति नहीं मिलती। गरुड़ पुराण में बताया गया है कि दस दिनों के पिंडदान से जीवात्मा के सूक्ष्म शरीर के विभिन्न अंगों का निर्माण होता है। इसी शरीर से वह यमलोक की यात्रा करती है। इसके बिना वह असहाय है।
पिंडदान न होने से जीवात्मा भूख-प्यास से अत्यंत व्याकुल रहती है। वह अपने परिजनों के पास जाती है, रोती है, परंतु कुछ नहीं मिलता। यमदूत उसे पकड़कर घसीटते हुए ले जाते हैं — क्योंकि पिंडदान के बिना उसके पास कोई शक्ति नहीं।
इसीलिए सनातन धर्म में मृत्यु के बाद दस दिन तक पिंडदान और तेरहवें दिन श्राद्ध का अत्यंत महत्वपूर्ण विधान है।





