विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण में इस विषय का हृदयविदारक वर्णन है। जब जीव का पिंडदान नहीं होता, तो यममार्ग पर उसे भूख-प्यास की अत्यंत तीव्र पीड़ा होती है और उसे जो मिलता है वह और भी कष्टकारी है।
गरुड़ पुराण के अनुसार — जिस जीव का पिंडदान नहीं हुआ, वह यममार्ग पर भूख-प्यास से अत्यंत व्याकुल होता है। जब वह दानी आत्माओं को भोजन पाते हुए देखता है और कुछ माँगने की चेष्टा करता है, तो यमदूत उसे रोक देते हैं।
वैतरणी नदी में — पिंडदान-विहीन जीव वैतरणी नदी में जब भूख-प्यास से व्याकुल होता है, तो वह उस नदी का रक्त-मांस-मवाद युक्त जल पीने पर विवश होता है। गरुड़ पुराण में कहा गया है — 'भूख-प्यास से व्याकुल होकर पापी रक्त का पान करते हैं।'
प्रेत-अवस्था में — जिसका पिंडदान नहीं होता, वह प्रेत बनकर भटकता है। उस अवस्था में उसे न सात्विक भोजन मिलता है, न जल। वह जो भी पाता है वह उसे पुनः दुर्गंध और मल ही देता है।
इसीलिए दसवें दिन तक नियमित पिंडदान की व्यवस्था की गई है — ताकि जीव को यमार्ग पर भोजन और शक्ति मिलती रहे।





