विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण और पुराणिक परंपरा में चित्रगुप्त द्वारा पुण्यों के प्रमाण की भी उतनी ही विश्वसनीय व्यवस्था है जितनी पापों के लिए।
सम्पूर्ण लेखा — चित्रगुप्त की पंजिका में केवल पाप नहीं, समस्त पुण्यकर्म भी लिखे हैं। दान, सेवा, व्रत, तीर्थ, भक्ति, सत्यवादिता, माता-पिता की सेवा — हर एक पुण्य का लेखा है।
पुण्य के गवाह — गरुड़ पुराण में बताया गया है कि जीव के जीवन के अच्छे कर्म और पापकर्म दोनों समान रूप से दर्ज हैं। चित्रगुप्त पुण्य को उतनी ही सटीकता से यमराज के समक्ष रखते हैं जितनी पाप को।
तुलनात्मक प्रस्तुति — चित्रगुप्त यमराज को पाप और पुण्य दोनों का तुलनात्मक लेखा देते हैं। यमराज इसी तुलना के आधार पर स्वर्ग, नरक या पुनर्जन्म का निर्णय लेते हैं।
पुण्य की सुरक्षा — जिस व्यक्ति ने जीवन में गुप्त दान किया — बिना प्रचार के, बिना दिखावे के — वह पुण्य भी चित्रगुप्त की पंजिका में उतनी ही निश्चितता से दर्ज है। यहाँ न्याय में कोई चूक नहीं।
इस प्रकार चित्रगुप्त केवल 'पाप के लेखाकार' नहीं — वे संपूर्ण कर्म के निष्पक्ष संरक्षक हैं।





