विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण के चतुर्थ अध्याय में चोरी के विभिन्न प्रकारों और उनके दंडों का वर्णन है।
सामान्य चोरी — 'पयू नरक में चोरी करने वालों को मल में गिराया जाता है।' यह अत्यंत अपमानजनक दंड है।
स्वर्ण-चोरी (महापाप) — स्वर्णस्तेय पंच महापापों में से एक है। इसके लिए विशेष और अत्यंत कठोर नरक का विधान है।
गरुड़-पुर और धन-हरण — 'ऋण लेकर उसे न लौटानेवाले, धरोहर को हड़पने वाले — ये वैतरणी में दुःख भोगते हैं।'
छल से धन-अर्जन — गरुड़ पुराण के चतुर्थ अध्याय में — 'छल से धन का अर्जन करने वाले, चोरी द्वारा आजीविका चलाने वाले — ये वैतरणी तटस्थित शाल्मी-वृक्ष में जाते हैं।'
पुनर्जन्म में — 'दूसरों की मेहनत की कमाई को छल-कपट से छीनने वाले जीवन में कभी स्थायी सुख प्राप्त नहीं कर पाते।' अगले जन्म में भी दरिद्रता और कष्ट मिलता है।





