विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण में धर्मराज (यमराज) द्वारा दंड देने की प्रक्रिया का विस्तृत वर्णन है। यह दंड-व्यवस्था पूर्णतः कर्मों पर आधारित है।
दंड की प्रक्रिया — चित्रगुप्त द्वारा कर्मों का लेखा प्रस्तुत होने के बाद धर्मराज पाप-पुण्य का तुलनात्मक मूल्यांकन करते हैं। यदि पुण्य अधिक हो तो स्वर्ग का निर्णय। यदि पाप अधिक हो तो उस पाप की गंभीरता के अनुसार नरक का निर्धारण।
नरक-विधान — गरुड़ पुराण में 84 लाख नरकों का वर्णन है जिनमें 21 घोर नरक प्रमुख हैं। धर्मराज यह निर्धारित करते हैं कि किस पाप के लिए कौन-सा नरक उचित है और वहाँ कितने समय तक यातना भोगनी होगी। यह दंड-विधान अत्यंत सटीक है — हर पाप का हर नरक अलग।
दंड की प्रकृति — नरक में यमदूत लोहे की लाठियों, मुद्गरों, गदाओं और कोड़ों से दंड देते हैं। पाप के अनुसार दंड की प्रकृति बदलती है।
अस्थायी दंड — गरुड़ पुराण में कहा गया है कि स्वर्ग और नरक दोनों अस्थायी हैं। पुण्य समाप्त होने पर स्वर्ग से, पाप-दंड पूरा होने पर नरक से वापस पुनर्जन्म होता है।
धर्मराज का निर्णय अटल होता है — उसे बदला नहीं जा सकता।





