विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण में एकादशाह का अत्यंत विशेष और निर्णायक महत्व बताया गया है।
दशगात्र की पूर्णता — दस दिनों में प्रेत-शरीर का निर्माण हो जाता है। ग्यारहवें दिन वह शरीर पूर्ण होता है और उसे आगे की यात्रा के लिए सभी आवश्यक दान-पुण्य प्रदान किए जाते हैं।
सर्वाधिक दान का दिन — गरुड़ पुराण के बारहवें अध्याय में इस दिन के लिए जो दानों की सूची है वह सर्वाधिक लंबी है — 'मृत-शय्यादान, गोदान, घटदान, अष्टमहादान, वृषोत्सर्ग' — ये सब इसी दिन होते हैं।
सूतक-मुक्ति — इस दिन परिवार अपने अशौच (सूतक) से मुक्त होता है और शुद्ध होकर आगे की क्रियाएँ कर सकता है।
यात्रा-प्रारंभ — ग्यारहवें दिन के कर्मों के बाद ही प्रेत की यमलोक-यात्रा वास्तव में प्रारंभ होती है। इस दिन से ही 16 पड़ावों की यात्रा शुरू होती है।
गरुड़ पुराण का संदेश — इस दिन के सभी कर्म करने पर भगवान विष्णु प्रेत को मोक्ष की ओर अग्रसर करते हैं। गरुड़ पुराण के ग्यारहवें अध्याय में यह प्रार्थना है — 'हे अविनाशी विष्णु! आप प्रेत को मोक्ष प्रदान करने वाले हो।'


