विस्तृत उत्तर
यह प्रसंग कर्ण की अद्वितीय दानवीरता और इंद्र की कूटनीति का एक अविस्मरणीय वृत्तांत है।
इंद्र जानते थे कि जब तक कर्ण के पास कवच-कुंडल है, अर्जुन को कभी जीत नहीं मिल सकती। इसलिए उन्होंने एक योजना बनाई। सूर्यदेव को यह भान हो गया था और उन्होंने स्वप्न में कर्ण को पहले ही सावधान कर दिया। कर्ण ने कहा — 'मैं जानता हूँ, फिर भी दान से नहीं मुकरूंगा।'
कथा के अनुसार, कर्ण प्रतिदिन सूर्योपासना करते थे और उस समय कोई भी उनसे जो माँगे वह देते थे। एक दिन देवराज इंद्र एक वृद्ध ब्राह्मण का वेश धारण करके आए। उन्होंने पहले वचन माँगा — कर्ण ने हाथ में जल लेकर प्रण किया। तब उन्होंने माँगा — 'राजन! आपके शरीर के कवच और कुंडल मुझे चाहिए।'
कर्ण ने सब जानते हुए भी बिना हिचके अपने शरीर से कवच और कुंडल काटकर दे दिए। इंद्र कर्ण की इस अद्भुत दानवीरता से चकित और लज्जित हो गए। उन्होंने कहा — 'माँगो, तुम्हें क्या चाहिए।' तब कर्ण ने इंद्रास्त्र (अमोघशक्ति) माँगा — जो एक बार ही चल सकती थी पर अचूक थी।





