विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण में जलदान और वैतरणी के संबंध का वर्णन भूख-प्यास की पीड़ा के संदर्भ में मिलता है।
वैतरणी में जल का स्वरूप — वैतरणी नदी में स्वच्छ जल नहीं है। इसमें रक्त, मांस, मवाद और दुर्गंधयुक्त द्रव बहता है। यह जल पापी को और भी कष्ट देता है।
जलदान का फल — जिसने जीवन में जलदान किया हो — प्यासों को पानी पिलाया हो, तालाब या कुआँ बनवाया हो — उसे यमलोक के मार्ग पर और वैतरणी के तट पर कुछ राहत मिलती है।
गरुड़ पुराण का वचन — गरुड़ पुराण के तृतीय अध्याय में यमदूत पापियों से कहते हैं — 'सुलभ होने वाले भी जल और अन्न का दान कभी क्यों नहीं दिया?' यह कहते हुए वे अतिरिक्त दंड देते हैं — यही वैतरणी की यातना का मूल कारण है।
वैतरणी की दुर्गंध — जलदान न करने वाले को वैतरणी के दुर्गंधयुक्त, रक्त-मांस-मिश्रित जल में ही प्यास बुझानी पड़ती है।
तर्पण — मृत्यु के बाद परिजनों द्वारा जल से किया गया तर्पण भी प्रेत की वैतरणी-संबंधी यातना को कुछ कम करता है।
इस प्रकार जलदान वैतरणी की यातना से बचाने का प्रत्यक्ष साधन है।
आगे क्या पढ़ें
प्रश्न से जुड़े हब और आज के उपयोगी पंचांग लिंक