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नवरात्रि और कलश स्थापना परिचय⏱ 2 मिनट पठन

कलश ब्रह्मांड का प्रतीक कैसे है?

देवी भागवत और मार्कंडेय पुराण: कलश = ब्रह्मांड (हिरण्यगर्भ) और मानव शरीर का सूक्ष्म प्रतीक।

संक्षिप्त उत्तर

देवी भागवत और मार्कंडेय पुराण: कलश = ब्रह्मांड (हिरण्यगर्भ) और मानव शरीर का सूक्ष्म प्रतीक। मिट्टी = पृथ्वी, जल = जल तत्व, अखंड ज्योति = अग्नि, मंत्रोच्चार = वायु, नारियल = आकाश। पंचमहाभूतों का एकत्रीकरण।

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विस्तृत उत्तर

धर्मशास्त्रों, अठारह पुराणों (विशेषकर श्रीमद् देवी भागवत महापुराण एवं मार्कंडेय पुराण) तथा तंत्र-आगम ग्रंथों के गहन अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि कलश केवल जल भरने का एक सामान्य मृत्तिका या धातु का पात्र नहीं है, बल्कि यह संपूर्ण ब्रह्मांड (हिरण्यगर्भ) और मानव शरीर का सूक्ष्म प्रतीक है।

कलश के विभिन्न भाग ब्रह्मांड और मानव शरीर के विभिन्न तत्वों का प्रतिनिधित्व करते हैं:

— मिट्टी का पात्र और जौ (सप्तधान्य): पृथ्वी तत्व — जीवन की उर्वरता, स्थिरता और सृजन का आधार।

— कलश में भरा पवित्र जल: जल तत्व — जीवन-शक्ति और ब्रह्मांडीय चेतना के प्रवाह का सूचक।

— अखण्ड ज्योति: अग्नि तत्व — ईश्वरीय ज्ञान, तेज और वैराग्य का प्रतीक।

— दुर्गा सप्तशती का मंत्रोच्चार: वायु तत्व — मंत्रों की ध्वनि तरंगें वायु तत्व को जाग्रत करती हैं।

— कलश के मुख पर नारियल: आकाश तत्व — मानव चेतना (मस्तिष्क) का प्रतीक जो असीम आकाश से जुड़ता है।

यह कलश इस बात का प्रतीक है कि साधक नवें दिन तक स्वयं कैसा बनना चाहता है — स्थिर, पूर्ण, सीधा और अनंत आकाश की ओर उन्मुख।

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