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विस्तृत उत्तर
गुणों के आधार पर एक ही तत्त्व के अलग-अलग रूपों का वर्णन किया गया है। तमोगुण से युक्त होने पर वही कालरुद्र कहलाता है। रजोगुण से युक्त होने पर वह हिरण्यगर्भस्वरूप में प्रकट होता है। सत्त्वगुण से आविष्ट होने पर वह सर्वव्यापी विष्णुरूप में प्रकट होता है। गुणों से रहित होने पर वही महेश्वरस्वरूप में प्रकट होता है।
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शास्त्रीय स्रोत
श्रीलिङ्गमहापुराण, पूर्वभाग, अध्याय 1, PDF पृष्ठ 15, श्लोक 22
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