विस्तृत उत्तर
कपटमुनि ने प्रतापभानु से बड़ा छलकपट किया। उसने राजा से कहा कि यदि मैं रसोई बनाऊँ और तुम उसे ब्राह्मणों को परोसो — और मुझे कोई जानने न पावे — तो उस अन्न को जो-जो खायगा, वह तुम्हारा आज्ञाकारी बन जायगा।
चौपाई — 'जौं नरेस मैं करौं रसोई। तुम्ह परुसहु मोहि जान न कोई। अन्न सो जोइ जोइ भोजन करई। सोइ सोइ तव आयसु अनुसरई॥'
इसका अर्थ — हे नरपति! मैं यदि रसोई बनाऊँ और तुम उसे परोसो और मुझे कोई जानने न पावे, तो उस अन्नको जो-जो खायगा, सो-सो तुम्हारा आज्ञाकारी बन जायगा।
राजा ने इस योजना को मान लिया। कपटमुनि ने एक लाख उत्तम ब्राह्मणों को कुटुम्बसहित निमन्त्रण दिलवाया। फिर उसने छः रस और चार प्रकार का भोजन बनाया — पर उसमें विभिन्न प्रकार के पशुओं का माँस पकाकर मिला दिया। जब राजा परोसने लगा, तभी आकाशवाणी हुई — 'हे ब्राह्मणो! उठ-उठकर घर जाओ; यह अन्न मत खाओ, इसमें माँस मिला है।'
