विस्तृत उत्तर
यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है। जब स्थूल शरीर मृत्यु के बाद जल जाता है तो यह प्रश्न उठता है कि स्वर्ग-नरक में सुख-दुःख कौन भोगता है। सनातन शास्त्रों के अनुसार कर्मों का फल 'सूक्ष्म शरीर' से भोगा जाता है।
गरुड़ पुराण में बताया गया है कि मृत्यु के बाद 10 दिनों तक पिंडदान से जीवात्मा के लिए एक प्रेत शरीर का निर्माण होता है। इसी सूक्ष्म या प्रेत शरीर से आत्मा यमलोक की यात्रा करती है, वहाँ कर्मों का लेखा-जोखा होता है और उसके अनुसार स्वर्ग या नरक में फल भोगा जाता है।
वेदांत दर्शन के अनुसार सूक्ष्म शरीर में ही चेतना, संवेदना और भोग की क्षमता होती है। इसीलिए स्थूल शरीर के नष्ट होने पर भी सूक्ष्म शरीर से सुख-दुःख का अनुभव होता है।
यह सूक्ष्म शरीर तब तक बना रहता है जब तक सारे कर्मों का फल भोगकर पुनः नया स्थूल शरीर धारण नहीं होता। मोक्ष की अवस्था में सूक्ष्म शरीर भी विसर्जित हो जाता है और आत्मा अपने शुद्ध स्वरूप में स्थित हो जाती है।





