विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण के अनुसार, वैतरणी नदी पार करने की क्षमता जीव के जीवनकाल के कर्मों और दान-पुण्य पर निर्भर करती है। सभी जीव इसे समान रूप से पार नहीं कर सकते।
पुण्यात्माओं के लिए — जिन्होंने जीवन में गौदान, तीर्थयात्रा, व्रत, दान और भक्ति की हो, उनके लिए वैतरणी पार करना सुगम होता है। गौदान करने वाले को गाय की सहायता मिलती है। दानी को नाव मिलती है।
साधारण पुण्यकर्मियों के लिए — जिन्होंने संक्रांति, सूर्यग्रहण, चंद्रग्रहण या अमावस्या आदि पुण्यकाल में श्रेष्ठ दान दिए हों, उन्हें एक निश्चित समय के पश्चात इस नदी से निकाल लिया जाता है।
पापियों के लिए — जिनके पास कोई दान-पुण्य नहीं, वे इस नदी में बहुत लंबे समय तक यातना भोगते हैं। उन्हें नाक में कांटा फंसाकर खींचा जाता है।
गरुड़ पुराण के चतुर्थ अध्याय में कहा गया है — 'प्राणियों को चाहिए कि वे जीवित रहते दान-कर्म और धर्म का संग्रह करें।' यही वैतरणी पार करने का सबसे सुनिश्चित उपाय है।





