विस्तृत उत्तर
नहीं। गरुड़ पुराण में स्पष्ट रूप से पापों की विभिन्न श्रेणियाँ बताई गई हैं।
गरुड़ पुराण में पाप-वर्गीकरण — गरुड़ पुराण के चतुर्थ अध्याय 'नरक प्रदान करने वाले पाप कर्म' में भगवान विष्णु गरुड़ को विभिन्न पापों और उनके विभिन्न दंडों का वर्णन करते हैं। यह स्वयं ही सिद्ध करता है कि पाप समान नहीं हैं।
महापाप (सबसे गंभीर) — ब्रह्महत्या, गोहत्या, सुरापान, गुरुपत्नी-गमन, स्वर्ण-चोरी — इन्हें 'पंच महापाप' कहा गया है। वृषोत्सर्ग के बारे में कहा गया है कि 'मित्रद्रोही, कृतघ्न, सुरापान करने वाला, गुरुपत्नीगामी, ब्रह्महत्यारा' — ये महापापी हैं।
सामान्य पाप — झूठ बोलना, चोरी, परनिंदा, छल-कपट — ये भी पाप हैं परंतु इनका दंड महापापों जितना कठोर नहीं।
छोटे पाप — मन में बुरे विचार, गलत वाणी — ये भी पाप हैं परंतु इनका फल हल्का होता है।
संक्षेप में — गरुड़ पुराण में 'महापाप', 'पाप' और 'उप-पाप' — तीन स्तर हैं और प्रत्येक के लिए अलग दंड है।



