विस्तृत उत्तर
साधक को कभी भी केवल 'सर्प' या 'नाग' का स्वतंत्र रूप से ध्यान नहीं करना चाहिए।
केवल सर्प का ध्यान उग्र और अनियंत्रित हो सकता है।
ध्यान सदैव 'शिव-आभूषण' (शिवलिंग पर लिपटे हुए) या 'विष्णु-शैया' (शेषनाग) के रूप में, अर्थात 'शिव-आश्रित' या 'विष्णु-आश्रित' रूप में ही करना चाहिए।
इसका कारण यह है कि नागों का संबंध सीधे 'कुंडलिनी-शक्ति' से होता है, जो शरीर की मूलाधार-चक्र में स्थित है। गलत ध्यान से यह शक्ति अनियंत्रित रूप से जाग्रत होकर साधक को लाभ के स्थान पर हानि पहुँचा सकती है।




