विस्तृत उत्तर
नाग-साधना, विशेष रूप से वैदिक 'सर्प सूक्त' का पाठ या 'रुद्रयामल' जैसे तांत्रिक प्रयोग, अत्यंत संवेदनशील हैं।
नागों का संबंध सीधे 'कुंडलिनी-शक्ति' से होता है, जो शरीर की मूलाधार-चक्र में स्थित है।
इन मंत्रों के गलत उच्चारण या गलत विधि से यह शक्ति अनियंत्रित रूप से जाग्रत होकर साधक को लाभ के स्थान पर हानि पहुँचा सकती है।
इसीलिए, किसी भी गंभीर अनुष्ठान से पूर्व 'गुरु पूजन' और योग्य 'गुरु-निर्देशन' को अनिवार्य माना गया है।





