विस्तृत उत्तर
शास्त्रों में नौ दिनों के इस तपस्या-काल के लिए कठोर नियमों का विधान किया गया है। ये नियम केवल शारीरिक शोधन के लिए नहीं, अपितु आध्यात्मिक ऊर्जा के संरक्षण और कुण्डलिनी जागरण के लिए नितांत आवश्यक हैं।
शारीरिक और मानसिक ब्रह्मचर्य का अखंड रूप से पालन करना अनिवार्य है। साधक को अपने विचारों, कर्मों और पर्यावरण में अत्यधिक शुद्धता (Purity) बनाए रखनी चाहिए।
कलह, ईर्ष्या, क्रोध, काम या निंदा जैसे नकारात्मक व्यवहार से सर्वथा बचना चाहिए, क्योंकि ये वृत्तियाँ तपस्या की ऊर्जा को क्षीण कर देती हैं।





