विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण में नरक से जीव के भागने की असंभवता का स्पष्ट वर्णन है।
पहला कारण — यमदूतों का पहरा। नरक में चारों ओर यमदूत हैं जो पापी जीव को देखते रहते हैं। वे उसे किसी भी प्रकार से निकलने नहीं देते।
दूसरा कारण — जंजीरों और पाश का बंधन। जीव गर्दन, हाथ और पैरों में जंजीरों से बँधा होता है। पीठ पर लोहे के भार होते हैं। इस अवस्था में भागना शारीरिक रूप से असंभव है।
तीसरा कारण — कर्म का नियम। गरुड़ पुराण का मूल सिद्धांत यही है — कोई भी जीव अपने कर्मफल से नहीं भाग सकता। नरक उसी कर्मफल का भोगस्थान है। भागना कर्म के नियम को तोड़ना होगा जो असंभव है।
चौथा कारण — नरक का स्वरूप ऐसा है कि भागने का कोई रास्ता नहीं। कुंभीपाक में उबलता तेल, तामिस्त्र में घोर अंधेरा, अवीचि में जलता पर्वत — हर ओर से बंधा हुआ है।
पाँचवाँ कारण — पाप पूरा भोगना अनिवार्य है। 'नाभुक्तं क्षीयते कर्म' — गरुड़ पुराण में यह श्लोक आता है — जिसका अर्थ है 'बिना भोगे कर्म का नाश नहीं होता।'





