विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण में नरक में भेजने की प्रक्रिया स्पष्ट रूप से वर्णित है। यह कोई एकाकी निर्णय नहीं है — इसमें एक व्यवस्थित न्याय-प्रक्रिया है।
यमदूत — वे यमलोक में जीव को लेकर आते हैं। यमदूत स्वयं नरक का निर्णय नहीं लेते — वे केवल जीव को यमराज के समक्ष प्रस्तुत करते हैं।
चित्रगुप्त — यमलोक में चित्रगुप्त जीव के समस्त कर्मों का लेखा यमराज को प्रस्तुत करते हैं। उनके इस लेखे के बिना न्याय संभव नहीं।
यमराज (धर्मराज) — वे समस्त कर्मों का निष्पक्ष मूल्यांकन करके यह निर्णय लेते हैं कि जीव को किस नरक में, कितने समय के लिए भेजना है। उनका निर्णय अंतिम और अटल है।
गरुड़ पुराण के तीसरे अध्याय में कहा गया है — 'यमराज की आज्ञा से यमदूत जीव को नरक में ले जाते हैं।' अर्थात् यमराज की आज्ञा के बिना कोई भी जीव नरक में नहीं जाता।
यह व्यवस्था यह सुनिश्चित करती है कि न्याय पूर्णतः निष्पक्ष, तथ्य-आधारित और अनुचित नहीं है।





