विस्तृत उत्तर
शास्त्रों के अनुसार 'प्रदोष' (प्र+दोष) का शाब्दिक अर्थ 'दोषों का निवारण' या रात्रि का आरंभ है। यह दिन और रात का वह पवित्र संधिकाल है जब भगवान शिव अपने भीतर ब्रह्मांड की सारी नकारात्मक ऊर्जा को समाहित कर उसे परमानंद में बदल देते हैं। इस दिव्य काल में पूजा करने से जीवन के पाप, पितृ-दोष और ग्रह-दोष नष्ट होते हैं और तीव्र शिव-कृपा प्राप्त होती है।





