विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण में प्रेत के रहने की अवधि का वर्णन परिस्थितियों के अनुसार भिन्न-भिन्न है।
सामान्य मृत्यु में — 13 दिन। गरुड़ पुराण में यही प्रमुख वर्णन है। 13वें दिन सपिंडन विधान के बाद जीव प्रेत योनि से मुक्त होता है और यमलोक की यात्रा प्रारंभ होती है।
अकाल मृत्यु में — शेष प्राकृतिक आयु तक। 'यमराज जब देखते हैं कि जीव अपेक्षित समय से पहले मरा है, तो उसे बाकी समय के लिए प्रेत योनि में व्यतीत करना पड़ता है।' उदाहरणतः 60 वर्ष की आयु में 45 वर्ष में मरने पर 15 वर्ष प्रेत योनि में।
बिना संस्कार के — 'जिनका पिंडदान नहीं होता, वे कल्पान्त तक प्रेत बनकर निर्जन वन में भ्रमण करते रहते हैं।' — यह सबसे दीर्घ प्रेत-काल है।
मोहग्रस्त आत्माओं के लिए — जो परिवार या संपत्ति के मोह से जकड़ी हैं, वे भी लंबे समय तक प्रेत योनि में रहती हैं जब तक मोह समाप्त न हो।
इस प्रकार प्रेत की अवधि जीव के कर्मों, मृत्यु की प्रकृति और परिजनों के संस्कारों पर निर्भर करती है।





