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प्रेत को जल न मिलने पर क्या होता है?

प्रेत को जल न मिलने पर — यममार्ग पर तृष्णा की असहनीय पीड़ा, मूर्च्छा, वैतरणी में रक्त-मवाद पीने को बाध्य।

संक्षिप्त उत्तर

प्रेत को जल न मिलने पर — यममार्ग पर तृष्णा की असहनीय पीड़ा, मूर्च्छा, वैतरणी में रक्त-मवाद पीने को बाध्य। 'वहाँ कहीं जल नहीं दिखता' — गरुड़ पुराण का यही वर्णन है। तर्पण से यह पीड़ा कम होती है।

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विस्तृत उत्तर

गरुड़ पुराण में प्रेत को जल न मिलने की स्थिति का वर्णन यममार्ग और वैतरणी नदी के संदर्भ में मिलता है।

यममार्ग पर जल का अभाव — गरुड़ पुराण के द्वितीय अध्याय में कहा गया है — 'वहाँ कहीं जल भी नहीं दिखता, जिसे अत्यंत तृषातुर वह जीव पी सके।' यह यममार्ग पर सबसे बड़ी पीड़ाओं में से एक है।

तृष्णा की असहनीय वेदना — प्रेत के वासनामय शरीर में जल की वासना होती है। जल न मिलने पर तृष्णा की पीड़ा इतनी तीव्र होती है कि जीव मूर्च्छित हो जाता है।

वैतरणी में दुर्गंधयुक्त जल — वैतरणी नदी में जल नहीं, रक्त-मांस-मवाद बहता है। जल-विहीन प्रेत इसी से अपनी प्यास बुझाने को बाध्य है।

तर्पण का महत्व — इसीलिए परिजनों द्वारा जल-तिल का तर्पण किया जाता है। गरुड़ पुराण में कहा गया है — 'जो परिजन शरीर छोड़ चुके हैं, वे चाहे किसी भी लोक में हों, तर्पण से उन्हें तृप्ति प्राप्त होती है।'

जलदान का कारण — यही कारण है कि जीवन में जलदान और मृत्यु के बाद तर्पण को इतना महत्व दिया गया है।

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