विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण में प्रेत-अवस्था के कष्टों का विस्तृत वर्णन है।
भूख और प्यास — सबसे पहला और प्रमुख कष्ट। प्रेत-आत्मा सूक्ष्म शरीर में होती है परंतु भूख-प्यास की पीड़ा तीव्र होती है। बिना पिंडदान के यह कष्ट और अधिक होता है।
अकेलापन और असहायता — परिजनों के बीच रहते हुए भी उनसे संवाद नहीं हो पाता। अदृश्य होने की पीड़ा असहनीय होती है।
यमदूत का भय — यमदूत के पाश में बँधे होने से स्वतंत्रता नहीं। शरीर में वापस नहीं जा सकते।
पापकर्मों का स्मरण — यममार्ग और प्रेत-अवस्था में पापकर्म बार-बार याद आते हैं जिससे पश्चाताप की पीड़ा होती है।
यममार्ग की यातनाएँ — गर्म बालू, कोड़े, कुत्तों का काटना — ये कष्ट यात्रा में होते हैं।
स्वजनों के रोने का दुख — गरुड़ पुराण में कहा गया है — 'मृत आत्मा अपने परिजनों को रोते-बिलखते देखकर स्वयं भी रोने लगती है, परंतु वह कुछ कर नहीं पाती।'
निर्जन वन में भटकना — बिना संस्कार वाले प्रेत को कल्पान्त तक निर्जन वन में भटकना पड़ता है।




