विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण में पिंडदान की आवश्यकता को तीन मुख्य कारणों से समझाया गया है।
शरीर-निर्माण — मृत्यु के बाद स्थूल शरीर जल जाता है। प्रेत को यमलोक की यात्रा करनी है परंतु उसके पास कोई शरीर नहीं। गरुड़ पुराण में कहा गया है — 'दग्धे देहे पुनर्देहः पिण्डैरुत्पद्यते' — पिंडों से नई यातना-देह उत्पन्न होती है। बिना इस देह के वह यात्रा नहीं कर सकता।
पोषण और शक्ति — पिंडदान प्रेत के लिए भोजन का कार्य करता है। यममार्ग पर भूख-प्यास की तीव्र पीड़ा होती है। पिंडदान से यह कुछ कम होती है और यात्रा की शक्ति मिलती है।
मुक्ति की प्रक्रिया — गरुड़ पुराण में स्पष्ट कहा गया है — 'जिनका पिंडदान नहीं होता, वे कल्पान्त तक प्रेत बनकर निर्जन वन में भ्रमण करते रहते हैं।' पिंडदान के बिना प्रेत न यात्रा कर सकता है, न मुक्त हो सकता है। यह मुक्ति-मार्ग का प्रथम और अनिवार्य चरण है।
यमदूतों का व्यवहार — पिंडदान प्राप्त जीव के साथ यमदूत कुछ सौम्य होते हैं।
इस प्रकार पिंडदान केवल एक धार्मिक विधि नहीं — यह प्रेत की वास्तविक आवश्यकता है।





