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प्रेत को पिंडदान क्यों आवश्यक है?

प्रेत को पिंडदान इसलिए आवश्यक है क्योंकि इससे यात्रा-शरीर बनता है, यममार्ग की भूख-शक्ति मिलती है और मुक्ति-प्रक्रिया शुरू होती है।

संक्षिप्त उत्तर

प्रेत को पिंडदान इसलिए आवश्यक है क्योंकि इससे यात्रा-शरीर बनता है, यममार्ग की भूख-शक्ति मिलती है और मुक्ति-प्रक्रिया शुरू होती है। बिना पिंडदान के प्रेत कल्पान्त तक भटकता रहता है।

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विस्तृत उत्तर

गरुड़ पुराण में पिंडदान की आवश्यकता को तीन मुख्य कारणों से समझाया गया है।

शरीर-निर्माण — मृत्यु के बाद स्थूल शरीर जल जाता है। प्रेत को यमलोक की यात्रा करनी है परंतु उसके पास कोई शरीर नहीं। गरुड़ पुराण में कहा गया है — 'दग्धे देहे पुनर्देहः पिण्डैरुत्पद्यते' — पिंडों से नई यातना-देह उत्पन्न होती है। बिना इस देह के वह यात्रा नहीं कर सकता।

पोषण और शक्ति — पिंडदान प्रेत के लिए भोजन का कार्य करता है। यममार्ग पर भूख-प्यास की तीव्र पीड़ा होती है। पिंडदान से यह कुछ कम होती है और यात्रा की शक्ति मिलती है।

मुक्ति की प्रक्रिया — गरुड़ पुराण में स्पष्ट कहा गया है — 'जिनका पिंडदान नहीं होता, वे कल्पान्त तक प्रेत बनकर निर्जन वन में भ्रमण करते रहते हैं।' पिंडदान के बिना प्रेत न यात्रा कर सकता है, न मुक्त हो सकता है। यह मुक्ति-मार्ग का प्रथम और अनिवार्य चरण है।

यमदूतों का व्यवहार — पिंडदान प्राप्त जीव के साथ यमदूत कुछ सौम्य होते हैं।

इस प्रकार पिंडदान केवल एक धार्मिक विधि नहीं — यह प्रेत की वास्तविक आवश्यकता है।

उत्तर को थोड़ा और स्पष्ट करें

प्रेत को पिंडदान क्यों आवश्यक है को संदर्भ सहित समझें

प्रेत को पिंडदान क्यों आवश्यक है का सबसे सीधा सार यह है: प्रेत को पिंडदान इसलिए आवश्यक है क्योंकि इससे यात्रा-शरीर बनता है, यममार्ग की भूख-शक्ति मिलती है और मुक्ति-प्रक्रिया शुरू होती है। बिना पिंडदान के प्रेत कल्पान्त तक भटकता...

जीवन एवं मृत्यु जैसे विषयों में यह देखना जरूरी होता है कि बात किस परिस्थिति में लागू होती है, किन नियमों के साथ मान्य होती है और व्यवहार में इसका सही अर्थ क्या निकलता है.

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