विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण के तेरहवें अध्याय का नाम ही 'सपिण्डनादि-सर्वकर्मनिरुपण' है — जो सपिंडीकरण की सम्पूर्ण विधि का वर्णन करता है।
शाब्दिक अर्थ — 'स' = साथ, 'पिंड' = पिंड/शरीर। सपिंडन का अर्थ है — प्रेत के पिंड को पितरों के पिंड में मिला देना।
सपिंडीकरण क्या है — मृत्यु के एक वर्ष बाद किया जाने वाला वह विशेष श्राद्ध जिसमें नव-मृत व्यक्ति की आत्मा को 'प्रेत' की श्रेणी से निकालकर 'पितर' की श्रेणी में सम्मिलित किया जाता है। इस दिन नए मृत का पिंड तीन पितरों के पिंडों में मिला दिया जाता है — यही 'पिंड-मेलन' या सपिंडन है।
गरुड़ पुराण का वचन — 'ग्यारहवें दिन श्राद्ध करके सपिण्डीकरण करना चाहिए।' — यह एक वर्ष बाद किया जाता है।
तीन श्रेणियाँ — सनातन परंपरा में पितरों की तीन पीढ़ियाँ होती हैं — पिता, पितामह, प्रपितामह। सपिंडन के बाद नया पितर इस श्रृंखला में सम्मिलित हो जाता है और सबसे पुरानी पीढ़ी 'अतिवाहिक' हो जाती है।





