विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण में श्राद्ध और पिंडदान दोनों का उल्लेख है। ये एक-दूसरे से संबंधित हैं परंतु भिन्न हैं।
पिंडदान — पिंडदान एक विशिष्ट क्रिया है। 'पिंड' जल, तिल, जौ या चावल से बने गोल अन्न-पिंड हैं जो मृत आत्मा को अर्पित किए जाते हैं। इसका उद्देश्य है — प्रेत-शरीर का निर्माण करना और उसे भोजन देना। गरुड़ पुराण में कहा गया है — 'दग्धे देहे पुनर्देहः पिण्डैरुत्पद्यते।' पिंडदान मुख्यतः मृत्यु के 10 दिनों में और गया-श्राद्ध में होता है।
श्राद्ध — श्राद्ध एक व्यापक अवधारणा है। इसमें पिंडदान, तर्पण, ब्राह्मण-भोजन, दान-दक्षिणा सभी शामिल हैं। श्राद्ध का अर्थ है — श्रद्धापूर्वक किया गया समस्त पितृ-कर्म। गरुड़ पुराण के तेरहवें अध्याय में वार्षिक श्राद्ध में 'तीन पिंड दान करना चाहिए' — यह पिंडदान श्राद्ध का एक भाग है।
संक्षेप में भेद — पिंडदान श्राद्ध का एक अंग है परंतु श्राद्ध से बड़ा है। श्राद्ध में पिंडदान, तर्पण, ब्राह्मण-भोजन, दान-दक्षिणा — सभी सम्मिलित हैं। पिंडदान केवल पिंड-अर्पण की क्रिया है।





