विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण में श्राद्ध न करने पर पितरों की स्थिति का अत्यंत करुणाजनक और भयावह वर्णन है।
पितरों की भूख-प्यास — गरुड़ पुराण में वर्णित है कि पितर पितृपक्ष में पृथ्वी पर आते हैं और श्राद्ध-तर्पण की प्रतीक्षा करते हैं। यदि परिजन श्राद्ध न करें तो पितर भूखे-प्यासे लौट जाते हैं और निराश होकर शाप देते हैं।
पितृदोष — गरुड़ पुराण में स्पष्ट कहा गया है — 'जब तक पितरों की आत्मा संतुष्ट नहीं होती, तब तक उनके वंशजों को अनेक प्रकार के कष्टों का सामना करना पड़ता है।' इन कष्टों में संतानहीनता, रोग, व्यापार-हानि, गृह-कलह शामिल हैं।
प्रेत-दशा की निरंतरता — 'जिनका पिंडदान नहीं होता, वे कल्पान्त तक प्रेत बनकर निर्जन वन में भ्रमण करते रहते हैं।' श्राद्ध न होने पर प्रेत-अवस्था समाप्त नहीं होती।
पितर की याचना — गरुड़ पुराण के तेरहवें अध्याय में उल्लेख है — 'स्वर्ग में गये हुए पितर भी वृषोत्सर्ग और श्राद्ध की कामना करते हैं।' अर्थात् पितर भी अपने वंशजों से श्राद्ध की याचना करते रहते हैं।
कर्ता का पाप — गरुड़ पुराण में कहा गया है — 'एकोद्दिष्ट श्राद्ध नहीं करना चाहिए। ऐसा करने वाला पितृघातक होता है।' श्राद्ध न करना पितरों की हत्या के समान पाप है।





