विस्तृत उत्तर
सनातन दर्शन में मनुष्य के तीन शरीर माने गए हैं — स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर। इनमें से सूक्ष्म शरीर वह अदृश्य आवरण है जो स्थूल शरीर के भीतर रहता है और आँखों से दिखाई नहीं देता।
वेदांत के अनुसार सूक्ष्म शरीर सत्रह तत्वों से मिलकर बना होता है — पाँच ज्ञानेंद्रियाँ (कान, त्वचा, आँख, जिह्वा, नाक), पाँच कर्मेन्द्रियाँ (वाक्, हाथ, पाँव, उपस्थ, पायु), पाँच प्राण (प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान), तथा मन और बुद्धि। यह सूक्ष्म शरीर ही जीवात्मा का असली 'यात्री' है जो एक जन्म से दूसरे जन्म में जाता है।
जब स्थूल शरीर सो जाता है, तब सूक्ष्म शरीर स्वप्न में विचरण करता है। मृत्यु के समय स्थूल शरीर हमेशा के लिए गिर जाता है, परंतु सूक्ष्म शरीर आत्मा के साथ बना रहता है। इसी सूक्ष्म शरीर में जीवात्मा के सारे संस्कार, वासनाएँ और कर्मों के बीज संचित रहते हैं, जो अगले जन्म की दिशा तय करते हैं।
इसीलिए कहा जाता है कि मृत्यु के बाद व्यक्ति का व्यक्तित्व पूरी तरह समाप्त नहीं होता — उसके संस्कार सूक्ष्म शरीर में जीवित रहते हैं और नए जन्म में उसके स्वभाव और बुद्धि को प्रभावित करते हैं।





