विस्तृत उत्तर
प्रसाद बांटना = तीर्थ पुण्य साझा करना; पुण्य बढ़ता है।
किसे: परिवार (सबसे पहले), पड़ोसी, मित्र, बुजुर्ग (विशेष सम्मान), गरीब/जरूरतमंद। किसी को 'ना' न कहें — मांगे तो अवश्य दें।
कैसे: शुद्ध हाथों से; प्रसाद जमीन पर न रखें; सम्मानपूर्वक (दोनों हाथ); 'हर हर महादेव'/'जय श्री राम' बोलकर।
क्या बांटें: मंदिर प्रसाद (लड्डू/पेड़ा), तीर्थ जल (छोटी बोतल), भस्म/कुमकुम/तुलसी, तीर्थ की विशेषता (तिरुपति लड्डू, शिरडी उदी, काशी बनारसी पान)।
मात्रा गौण; भाव प्रधान। एक लड्डू 10 में बांटें = 10 गुना पुण्य।





