विस्तृत उत्तर
भूमि या भवन निर्माण के समय दिशाओं, कोणों या पंचतत्वों के असंतुलन से जो दोष उत्पन्न होता है, उसे वास्तु दोष कहते हैं। इस दोष के कारण घर में रहने वालों को शारीरिक कष्ट, आर्थिक हानि और बिना कारण विवाद का सामना करना पड़ता है। तोड़-फोड़ किए बिना इस दोष को ध्वनि तरंगों से दूर किया जा सकता है।
वास्तु दोष शमन के लिए ऋग्वेद में वर्णित वास्तु पुरुष का सिद्ध मंत्र अत्यंत प्रभावशाली है: 'ॐ वास्तोष्पते प्रति जानीह्यस्मान स्वावेशो अनमीवो भवा नः। यत् त्वेमहे प्रति तन्नो जुषस्व शं नो भव द्विपदे शं चतुष्पदे॥' इसके अतिरिक्त सरल मंत्र 'ॐ वास्तु पुरुषाय नमः' का भी प्रयोग किया जा सकता है। घर के ब्रह्मस्थान (बीच के हिस्से) में बैठकर या ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) में जल का कलश रखकर इस मंत्र का नियमित जप करने से वास्तु देव शांत होते हैं और भवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।





