विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण में यममार्ग में गर्मी और अग्नि का वर्णन अनेक दृष्टियों से महत्वपूर्ण है।
गरुड़ पुराण में वर्णित है — 'सूर्य, दावाग्नि एवं वायु के झोंकों से संतृप्त होते हुए' पापी जीव यममार्ग पर चलता है। 'तपी हुई बालू से पूर्ण तथा विश्राम रहित और जल रहित मार्ग' पर उसे जाना पड़ता है।
आध्यात्मिक दृष्टि से — अग्नि पाप को जलाने का प्रतीक है। जिस प्रकार अग्नि अशुद्धि को जलाती है, उसी प्रकार यममार्ग की गर्मी और अग्नि पापी जीव के संचित पापों को भोगाने की प्रक्रिया है। यह पाप-शुद्धि की एक कठोर प्रक्रिया है।
कर्म-दृष्टि से — जिस व्यक्ति ने जीवन में दूसरों को जलाया — उनके मन में पीड़ा दी, उनका शोषण किया — वह मृत्यु के बाद स्वयं उस जलन को भोगता है। यह कर्म का प्रत्यक्ष न्याय है।
प्रतीकात्मक दृष्टि से — यममार्ग की गर्मी उस आत्मा की जलन को भी दर्शाती है जो अपने पापकर्मों को याद करके पछताती है। पछतावे की यह अग्नि भीतर और बाहर दोनों ओर से जलाती है।
वैतरणी नदी में भी 'आग की लपटें' निकलती हैं। यह पाप-शुद्धि की प्रक्रिया का एक और रूप है।





