विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण में अन्नदान को जीवन के सबसे सुलभ और सबसे आवश्यक दानों में से एक बताया गया है।
गरुड़ पुराण के तृतीय अध्याय में यमदूत नरक में पापियों को मारते हुए कहते हैं — 'अरे दुराचारियों! सुलभ होने वाले भी जल और अन्न का दान कभी क्यों नहीं दिया?' यह एकमात्र उलाहना जो यमदूत देते हैं — वह अन्नदान और जलदान न करने का है — यह इनके महत्व का सबसे बड़ा प्रमाण है।
यममार्ग पर अन्न का अभाव — यममार्ग पर 'अन्न भी नहीं है' — यह गरुड़ पुराण का वर्णन है। जिसने जीवन में अन्नदान किया, उसे यमलोक के मार्ग पर भोजन मिलता है। जिसने नहीं किया, वह भूखा तड़पता है।
प्रेत के लिए अन्न — मृत्यु के बाद परिजनों द्वारा दिया गया पिंडदान (अन्न-पिंड) प्रेत को शक्ति देता है। श्राद्ध में ब्राह्मणों को अन्न कराने से प्रेत-पितरों को तृप्ति मिलती है।
सर्वसुलभ दान — गरुड़ पुराण का संदेश है कि अन्नदान के लिए धनी होने की आवश्यकता नहीं। 'अन्न सुलभ है' — सामान्य व्यक्ति भी यह कर सकता है। इसीलिए इसका विशेष उल्लेख है।
सनातन परंपरा में 'अन्नदानं परं दानम्' — अन्नदान सर्वश्रेष्ठ दान है।


