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विस्तृत उत्तर
अशौच काल का मुख्य उद्देश्य परिजनों को सांसारिक कार्यों से विरत कर पूर्णतः प्रेत की सद्गति और उसके पारलौकिक देह-निर्माण पर ध्यान केंद्रित कराना है। मृत्यु के समय से लेकर सपिण्डीकरण पूर्ण होने तक घर और परिजनों में अशौच माना जाता है। इस काल में कई कर्म वर्जित हैं, जैसे आशीर्वाद देना, देव-प्रतिमा पूजा, पलंग पर शयन, सार्वजनिक संपर्क, संध्या-वंदन, दान, जप, हवन, वेद स्वाध्याय, देव-तर्पण, व्रत और ब्राह्मण-भोजन।
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