विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण के सातवें अध्याय में बभ्रुवाहन कथा में वर्णित मुक्ति का स्वरूप अत्यंत महत्वपूर्ण और स्पष्ट है।
प्रेतत्व से मुक्ति — सर्वप्रथम, दान और श्राद्ध के बाद वह प्रेत 'प्रेत-शरीर से मुक्त' हो जाता है। यह सबसे बड़ा परिवर्तन है — प्रेत-अवस्था समाप्त होती है।
परम गति — गरुड़ पुराण में कहा गया है — 'इस प्रकार शय्यादान, नवक आदि श्राद्ध और वृषोत्सर्ग का विधान करने से प्रेत परम गति को प्राप्त होता है।' परम गति अर्थात् मोक्ष या दिव्य लोक।
भगवान विष्णु की कृपा — गरुड़ पुराण में वर्णित है — 'मैं सदा उसे वर प्रदान करता हूँ और प्रेत को मोक्ष प्रदान करता हूँ।' भगवान विष्णु की यह कृपा ही अंतिम मुक्ति का स्रोत है।
यह मुक्ति विशेष क्यों — क्योंकि यह मुक्ति किसी परिजन ने नहीं बल्कि एक अनजान धर्मपरायण राजा ने दिलाई। यह सिद्ध करता है कि करुणापूर्ण दान-श्राद्ध किसी भी प्रेत को मुक्त कर सकता है।
कथा सुनने का फल — 'इस पुण्यप्रद इतिहास को जो सुनता है और सुनाता है, वे दोनों पापाचारों से युक्त होने पर भी प्रेतत्व को प्राप्त नहीं होते।'





