विस्तृत उत्तर
भरद्वाजजी ने याज्ञवल्क्यजी से रामकथा सुनने की इच्छा इसलिये प्रकट की क्योंकि उनके मन में एक बड़ा संदेह था — कि राम वही अवधेश (दशरथ) के कुमार हैं या वे कोई और परब्रह्म हैं जिनको शिवजी जपते हैं?
दोहा — 'संत कहहिं असि नीति प्रभु श्रुति पुरान मुनि गाव। होइ न बिमल बिबेक उर गुर सन किएँ दुराव॥'
अर्थ — हे प्रभो! संतलोग ऐसी नीति कहते हैं और वेद, पुराण तथा मुनिजन भी यही बतलाते हैं कि गुरुके साथ छिपाव करनेसे हृदयमें निर्मल ज्ञान नहीं होता।
आगे भरद्वाजजी ने कहा — 'अस बिचारि प्रगटउँ निज मोहू। हरहु नाथ करि जन पर छोहू। राम नाम कर अमित प्रभावा। संत पुरान उपनिषद गावा॥'
अर्थ — यही सोचकर मैं अपना अज्ञान प्रकट करता हूँ। हे नाथ! सेवकपर कृपा करके इस अज्ञानका नाश कीजिये। संतों, पुराणों और उपनिषदोंने रामनामके असीम प्रभावका गान किया है (यह सुनकर मुझे जिज्ञासा हुई)।

